भारत का इकलौता ऐसा जज जिसे फांसी पर लटकाया गया, वजह है बेहद खौफनाक

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दुनिया के इतिहास में अनेकों ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जब जज ने किसी अपराधी को फांसी की सज़ा सुनाई हो। लेकिन आपने आज तक ये नहीं सुना होगा कि किसी जज को ही फांसी पर लटकाया गया हो। ऐसा हुआ है। कई सालों पहले ऐसा हुआ है जब भारत में एक जज को ही फांसी पर लटकाया गया था। घटना काफी पुरान है लेकिन एकदम सत्य है। साल 1976 में एक जज को फांसी पर लटकाया गया था। जिस वजह से जज को फांसी पर लटकाया गया था वो बेहद खौफनाक थी।

जो भी जज को फांसी पर लटकाने की इस कहानी को सुनता है उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

कौन थे वो जज?

जिस जज का ज़िक्र हम यहां कर रहे हैं उसका नाम था उपेंद्र नाथ रोजखोवा। असम के ढुबरी ज़िले में ये जिला एंव सत्र न्यायधीश के तौर पर तैनात थे। यहीं पर उनको एक सरकारी आवास अलॉट किया गया था। उनके आस-पास भी सरकारी अधिकारियों के ही घर थे।

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क्या था मामला?

ये सन 1970 की घटना है। उपेंद्र नाथ रोजखोवा कुछ ही दिनों बाद रिटायर होने वाले थे। रिटायर होने के कुछ दिनों बाद तक भी उन्होंने अपना सरकारी बंगला खाली नहीं किया था। इसी बीच लोगों का ध्यान उनकी पत्नी और तीन बेटियों पर गया जो कि लंबे समय से दिखाई नहीं दी थी। लोग जब भी उनसे परिवार के बारे में पूछते थे तो वो कोई ना कोई बहाना मारकर बात बदल देते थे।

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कैसे फंसे पुलिस के चंगुल में?

अप्रैल 1970 में जज उपेंद्र नाथ रोजखोवा ने अपना सरकारी आवास खाली कर दिया और कहीं चले गए। उनकी जगह पर उस बंगले में दूसरे जज आ गए। राजखोवा कहां गए किसी को इस बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। राजखोवा की पत्नी का भाई पुलिस मे था और उसे जानकारी मिली कि वो सिलीगुड़ी के एक होटल में काफी लंबे समय से ठहरे हुए हैं। वो उन्हें ढूंढते हुए उस होटल में पहुंचे और वहां पहुंचकर उन्होंने जज उपेंद्र नाथ राजखोवा से अपनी बहन और भांजियों के बारे में पूछताछ की। राजखोवा ने कई तरह के बहाने बनाए। कमरे के अंदर ही उन्होंने आत्महत्या करने की भी कोशिश की थी। उनकी जान तो बच गई लेकिन उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।

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जज का कबूलनामा

कुछ दिनों बाद पुलिस के दबाव में राजखोवा ने कबूल कर लिया कि उन्होंने अपनी पत्नी और तीनों बेटियों की हत्या कर दी है। उनकी लाश को भी राजखोवा ने उसी सरकारी बंगले में गाड़ने की बात स्वीकार की जहां वो रहते थे। इस कबूलनामे के बाद राजखोवा को हिरासत में ले लिया गया। एक साल तक मुकदमा चला और आखिरकार राजखोवा को निचली अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई।

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राजखोवा ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने उनकी अपील ठुकार दी और निचली अदाल के फैसले को बरकरार रखा। राजखोवा सुप्रीम कोर्ट पहुंचे लेकिन वहां भी उन्हें माफ नहीं किया गया। बताया तो ये भी जाता है कि राष्ट्रपित के पास भी उन्होंने अपनी दया याचिका भिजवाई थी। लेकिन उन्हें तब भी माफी नहीं मिली।

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1976 की 14 फरवरी को असम की जोरहट जेल में राजखोवा को अपनी पत्नी और तीनों बेटियों के कत्ल के जुर्म में फांसी पर लटका दिया गया। लेकिन इस राज से कभी भी पर्दाफाश नहीं हो पाया कि आखिर क्यों उपेंद्र नाथ राजखोवा ने अपनी पत्नी और बेटियों की हत्या कर दी थी। इस तरह राजखोवा भारत के इकलौते जज बने जिन्हें फांसी पर भी लटकाया गया।

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जिस बंगले में राजखोवा ने इस जघन्य हत्याकांड को अंजाम दिया था उसे लोग भूत बंगला कहने लगे। वहां रहने वाले दूसरे जज ने भी वो बंगला खाली कर दिया और सालों तक वो बंगला वीरान पड़ा रहा। बाद में उस बंगले को तोड़ दिया गया। उसकी जगह अब नया कोर्ट परिसर बनवाया जा रहा है।

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