Somprabha Story Telling To Kalingsena: Badchalan Biwiyo ka Dweep

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Photo: Social Media

Somprabha Story Telling To Kalingsena. मॉडर्न कबूतर की इस खास पेशकश में आप सभी पाठकों का स्वागत है। मॉडर्न कबूतर की ये पेशकश दिग्गज लेखक स्वर्गीय श्री कृष्ण बलदेव वैद जी के कहानी संग्रह “Badchalan Biwiyo ka Dweep” में प्रकाशित कहानियों पर आधारित है। बदलचलन बीवियों का द्वीप पुस्तक में छपी कहानियों को बुक वाला एक एक करके आप सभी दर्शकों संग शेयर करेगा।

सबसे पहले आपको लेखक कृष्ण बलदेव वैद का संक्षिप्त जीवन परिचय दे दिया जाए। तो कृष्ण बलदेव वैद का जन्म हुआ था 27 जुलाई 1927 को पंजाब के डिंगा शहर में। आज़ादी के बाद ये शहर पाकिस्तान का हिस्सा हो गया है। इन्होंने अपनी पढ़ाई पंजाब यूनिवर्सिटी से की और डॉक्टरेट की उपाधि इन्होंने ली हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से।

इन्होंने भारत की कुछ यूनिवर्सिटीज़ में अध्यापन का कार्य भी किया और फिर ये सन 1966 में अमेरिका चले गए जहां इन्होंने न्यूयॉर्क स्टेट यूनिवर्सिटी और ब्रेंडाइज़ यूनिवर्सिटी में अध्यापन किया। रिटायरमेंट के बाद 1985 में ये भारत वापस लौटे और यहां इन्होंने लेखन किया और फिर तकरीबन दो दशक भारत में बिताने के बाद ये फिर से अमेरिका वापस लौट गए। वहीं पर 6 फरवरी 2020 को इन्होंने अपनी आखिरी सांस ली।

तो ये तो था लेख का परिचय और अब फटाफट शुरू करते हैं अपनी कहानी जो कि कहानी संग्रह Badchalan Biwiyo ka Dweep की पहली कहानी है। इस कहानी का नाम है सोमप्रभा और कलिंगसेना की विचित्र मित्रता। Somprabha Story Telling To Kalingsena.

और शुरू हो गई कहानी (Somprabha Story Telling To Kalingsena)

तक्षशिला राज्य के राजा कलिंगदत्त की एक नवयौवना पुत्री है जिसका नाम है कलिंगसेना। एक दिन कलिंगसेना अपने महल की छत पर विचारों में डूबी खड़ी थी कि तभी आकाश से उड़ती हुई जा रही असुर राजा मयासुर की बेटी सोमप्रभा की नज़र कलिंगसेना पर पड़ी। कलिंगसेना की सुंदरता देखकर स्त्री होते हुए भी सोमप्रभा उस पर मोहित हो गई।

कलिंगसेना को लेकर उसके मन में कई तरह के विचार उमड़ने लगे। लेकिन ये विचार अपवित्र बिल्कुल भी नहीं थे। सोमप्रभा ने एक सुंदर अप्सरा का वेश धारण किया और वो धीमे से विचारों में खोई कलिंगसेना के पास जाकर खड़ी हो गई।

कलिंग सेना भी सोमप्रभा को पसंद करने लगी (Somprabha Story Telling To Kalingsena)

जैसे ही कलिंगसेना की नज़र सोमप्रभा पर पड़ी तो वो हैरान या परेशान होने की जगह उसे एकटक देखती रही और सोमप्रभा के उस नकली रूप पर मोहित होने लगी। कलिंगसेना द्वारा खुद को इस तरह एकटक देखे जाने से सोमप्रभा थोड़ी विचलित हुई और वो कलिंगसेना से बोली, “सखी, यूं इस तरह मुझे ना घूरो। नहीं तो मेरा रहा-सहा कवच भी उतर जाएगा।”

सोमप्रभा की उस मधुरवाणी से कलिंगसेना और भी मदहोश हो गई और बोली, “कवच की अब हमें कोई ज़रूरत नहीं है सखी। हम हमेशा-हमेशा के लिए अभिन्न हो गई हैं।”

आगे सोमप्रभा कुछ ऐसा कहती है (Somprabha Story Telling To Kalingsena)

ये बात सुनकर सोमप्रभा पूरी तरह से सिहर गई थी। लेकिन उसने अपनी सिहरन को ज़ाहिर नहीं होने दिया। सोमप्रभा कलिंगसेना से बोली, “तुम ठहरी राजपुत्री। और एक राजपुत्री से मित्रता का कितना बड़ा जोखिम होता है, इससे जुड़ी एक कहानी तुम्हें सुनाती हूं। सुनोगी?

कलिंगसेना बोली, “सुनाओ ना। क्यों नहीं सुनूंगी।” और कलिंगसेना ने सोमप्रभा के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले अपनी आंखों को मूंद लिया। मानो सोमप्रभा को देवी हो और कोई दैवीय राग सुनाने वाली हो।सोमप्रभा अपनी कहानी शुरू करती है।

सोमप्रभा की विचित्र कहानी (Somprabha Story Telling To Kalingsena)

“पुष्करावती नाम की एक नगरी का राजा था गूढ़सेन। उसका इकलौता पुत्र जो कि उस राज्य का राजकुमार था, वो बेहद बिगड़ा हुआ था। राजा को अपने पुत्र का बिगड़ना बुरा तो बहुत लगता था। लेकिन पुत्रमोह के चलते वो कुछ कह नहीं पाता था। राजा अपने बिगड़े हुए पुत्र की सारी करतूतें चुपचाप सहता रहता। राजा मन ही मन सोचता था कि काश भगवान ने उसे एक और पुत्र दिया होता तो वो इस नालायक को ज़रूर सीधा कर देता।

एक दिन राजा का वो बिगड़ा हुआ बेटा अपने बाग में घूम रहा था। बाग में उसे एक युवक दिखाई दिया जो उसके राज्य के किसी धनी बनिए का पुत्र था और उसकी ही तरह रूपवान था। उस युवक से राजा के बेटे की बढ़िया दोस्ती हो गई।

बड़ी गहरी हो गई उन दोनों की मित्रता (Somprabha Story Telling To Kalingsena)

उनकी मित्रता इतनी गहरी हो गई कि वो सारा दिन साथ रहते। साथ घूमते-फिरते और साथ ही खाते-पीते। एक-दूसरे को खूब किस्से कहानियां सुनाया करते। अगर एक बीमार पड़ता तो दूसरा भी बीमार हो जाता। अगर एक उदास होता तो दूसरा भी उदास हो जाता। उन दोनों की ये दोस्ती देखकर राजा बेहद खुश था और मानने लगा था कि वैश्यपुत्र के साथ रहकर उसका बेटा शायद सुधर जाएगा।

फिर एक दिन जब राजकुमार ने अपने मित्र का विवाह कहीं पक्का करा दिया और खुद अपने विवाह की भी तैयारियां करने लगा तो राजा को यकीन हो गया कि अब जल्दी ही उसका बेटा भी सही रास्ते पर चलना शुरू कर देगा।

वैश्यपुत्र को सुनाई दी अजीब आवाज़ें (Somprabha Story Telling To Kalingsena)

अगले दिन राजकुमार और उसका दोस्त कुछ सैनिकों के साथ अपने लिए लड़की देखने एक दूसरे शहर के लिए चल पड़ा। शाम होते-होते इनका काफिला इक्षूमती नदी के तट पर रुका और इन्होंने वहीं पर रात गुज़ारने का फैसला किया। कुछ देर बाद जब चांद निकल आया तो मदिरापान शुरू हो गया। वैश्यपुत्र तो बेहद संभलकर पी रहा था।

लेकिन राजकुमार कुछ ही देर में धुत्त हो गया और सोने लगा। राजकुमार की एक सेविका ने उससे ज़िद की कि वो कोई कहानी सुनाए। राजकुमार ने अपने होश संभालते हुए कहानी शुरू तो की, लेकिन कुछ ही देर में वो पूरी तरह से ढेर हो गया और सो गया।

उस सेविका ने वैश्यपुत्र की तरफ देखा और फिर दोनों मुस्कुराए। फिर थोड़ी देर बाद वो सेविका भी सो गई। अब वैश्यपुत्र चुपचाप अकेला आसमान को निहारने लगा। तभी उसे कुछ औरतों की खुसर-पुसर की आवाज़ें सुनाई दी। उसने ध्यान से वो आवाज़ें सुनने की कोशिश की। कुछ ही देर में उसे वो आवाज़ें साफ-साफ सुनाई देने लगी।

राजपुत्र को मिला श्राप

“अजीब राजपुत्र है ये। कहानी पूरी किए बना ही सो गया। मैं इसे शाप देती हूं कि कल सुबह इसे हीरों का एक हार दिखाई देगा। अगर इसने वो हार उठाकर अपने गले में डाल लिया तो तुरंत इसकी मृत्यु हो जाएगी।” जैसे ही ये औरत चुप  हुई एक और औरत बोल पड़ी।

अगर ये हीरों के हार से किसी तरह बच भी गया तो यहां से कुछ आगे जाने के बाद इसे एक आम का पेड़ दिखाई देगा जिस पर बेतहाशा और बेहद खूबसूरत आम लदे होंगे। वो आम देखकर इसके मुंह में पानी आ जाएगा। लेकिन जैसे ही ये आम तोड़कर चूसना शुरू करेगा, इसके प्राण निकल जाएंगे।”

तीसरी और बोली

जैसे ही ये औरत चुप हुई तो एक और औरत चटखारा लेकर बोली, “अगर ये आम से भी बच गया तो जैसे ही ये अपने विवाह गृह में घुसेगा तभी विवाह गृह गिर जाएगा और उसके नीचे दबकर इसकी मौत हो जाएगी।” तीसरी औरत के चुप होने के बाद एक और औरत बोली,

“अगर ये विवाह गृह से भी बच गया तो जैसे ही ये अपनी पत्नी को भोगने के लिए शयन कक्ष में घुसेगा इसे छींक आने लगेंगी। एक दो नहीं, इसे पूरी सौ छींकें आएंगी। और अगर हर छींक के बाद किसी ने जिओ नहीं कहा तो इसके प्राण पखेरू हो जाएंगे।”

पांचवी औरत कुछ ऐसा बोली

जैसे ही ये और चुप हुई तो एक पांचवी और बोली,”अगर हमारी बातें नीचे बैठा इसका कोई सैनिक या मित्र सुन रहा है तो मैं उसे भी चेतावनी देती हूं कि वो ये सारी बातें इस राजकुमार को नहीं बताए। अगर उसने हमारी चेतावनी पर अमल नहीं किया तो उसके प्राणों की खैर नहीं होगी।” फिर उन औरतों की आवाज़ें आनी बंद हो गई। वो सब वहां से जा चुकी थी।

वैश्यपुत्र की पहली चुनौती

इन सभी महिलाओं की आवाज़ें सुनकर वैश्यपुत्र काफी चिंतित हो उठा। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि अब उसे क्या करना चाहिए। वो इतना चिंतित था कि उसे सारी रात नींद नहीं आ सकी। उसे ना केवल अपने मित्र की जान बचानी थी बल्कि खुद के प्राणों की सुरक्षा भी करनी थी। लेकिन कोई तरकीब उसे नहीं सूझ रही थी। अगली सुबह जब इनका काफिला थोड़ा आगे बढ़ा तो राजकुमार को रास्ते पर एक हीरों का हार गिरा नज़र आया।

 

उसने उस हार को पहनने की इच्छा जताई। लेकिन उसके मित्र वैश्यपुत्र ने उसे समझाया कि ये हार असली नहीं, बल्कि मायावी है। अगर असली होता तो औरों को भी नज़र आता। इसलिए इसे पहनने के बारे में नहीं सोचना चाहिए। मित्र की बात मानते हुए राजकुमार ने वो हार नहीं उठाया और आगे बढ़ गया।

वैश्यपुत्र की दूसरी चुनौती

कुछ दूर चलने के बाद राजकुमार को आमों से लदा हुआ एक पेड़ नज़र आया। जैसे ही राजकुमार ने आम तोड़ने के लिए अपना हाथ उठाया तो वैश्यपुत्र ने उसे रोका और कहा कि ये आम जंगली हैं और इन्हें खाने से उसका गला खराब हो सकता है। इन्हें ना ही खाया जाए तो बेहतर होगा। राजकुमार इससे खिन्न तो काफी हुआ लेकिन फिर भी उसने अपने मित्र की बात मान ली।

वैश्यपुत्र की तीसरी चुनौती

फिर जब उनका काफिला अपनी मंज़िल पर पहुंचा,

और राजकुमार अपने विवाह गृह में घुसने ही वाला था,

कि तभी वैश्यपुत्र ने उसका हाथ पकड़कर उसे पीछे खींच लिया,

और विवाह गृह के नीचे दबने से अपने राजपुत्र मित्र को बचा लिया।

अपने वैश्यमित्र की इस सतर्कता से राजकुमार खुश तो काफी हुआ।

लेकिन उसके मन में ये भावनाएं भी कोफ्त किए जा रही थी कि आज ये वैश्यपुत्र उसे कुछ करने क्यों नहीं दे रहा है। दूसरी तरफ अपनी सूझ-बूझ और चतुराई पर वैश्यपुत्र खुद से काफी प्रसन्न था। लेकिन वो जानता था कि सबसे मुश्किल पड़ाव तो अब आना है।

वैश्यपुत्र की मुसीबत

विवाह संपन्न होने के बाद राजपुत्र अपनी पत्नी से मिलने शयन कक्ष की तरफ बढ़ा।

उसने चारों तरफ देखा। उसे वैश्यपुत्र कहीं नज़र नहीं आया।

वो खुश था ये सोचकर कि चलो अब उसे रोकने वाला कोई नहीं है।

लेकिन राजपुत्र को ये नहीं मालूम था,

कि वैश्यपुत्र पहले ही शयन कक्ष में पलंग के नीचे जा छिपा था।

उसी पलंग पर राजकुमार की वधू अपने वर से मिलने के लिए तड़प रही थी।

जैसे ही राजकुमार भीतर आया, वधू की नज़रें नीची हो गई।

वहीं वैश्यपुत्र का खून भी खुस्क हो रहा था।

ये सोचकर कि अगर राजकुमार ने उसे पलंग के नीचे पकड़ लिया,

तो फिर राजकुमार को ये समझा पाना असंभव हो जाएगा कि वो वहां कर क्या रहा था।

राजकुमार को आई पहली छींक

जैसे ही राजकुमार पलंग पर बैठा उसे पहली छींक आई।

वैश्यपुत्र ने धीमे से कहा, जीओ। उसके बाद दूसरी छींक आई तो फिर कहा जीओ।

दूसरी छींक के साथ दुल्हन के मुंह से भी उई मां की आवाज़ निकली।

उसके बाद तो हर छींक पर दुल्हन के मुंह से उई मां की आवाज़ निकली,

और वैश्यपुत्र धीमे से बोलता, जीओ।

एक के बाद एक पूरी सौ छींके राजकुमार को आई,

और हर छींक पर दुल्हन के मुंह से उई मां की आवाज़ निकली।

हर छींक पर वैश्यपुत्र भी धीमे से जीओ बोलता चला गया।

और पकड़ा गया वैश्यपुत्र

आखिरकार जब राजकुमार की छींके बंद हुई तो कमरे में उसकी,

और उसकी पत्नी की कामुक छटपटाहटें शुरू हो गई।

वे आवाज़ें पलंग के नीचे लेटे वैश्यपुत्र को भी आ रही थी।

लेकिन उन आवाज़ों से वैश्यपुत्र और अधिक घबराने लगा था।

उसे लग रहा था कि कहीं उससे कोई मूर्खता ना हो जाए और वो पकड़ा ना जाए।

आखिरकार जब राजकुमार और उसकी वधू थककर सो गए,

तो वैश्यपुत्र धीमे से पलंग के नीचे से निकला और दरवाज़े से बाहर जाने लगा।

तभी अचानक राजकुमार की आंख खुल गई और अपने कमरे से,

वैश्यपुत्र को बाहर जाते देखकर वो बेहद क्रोधित हो गया।

उसने अपने उस वैश्यपुत्र मित्र को धिक्कारना शुरू कर दिया।

अब उसका राजसी अहंकार भी उस पर हावी हो चुका था।

उसने वैश्यपुत्र की एक ना सुनी और अपने सैनिकों से उसे पकड़वा दिया,

और सैनिकों को आदेश दिया कि इसे कल सुबह फांसी पर चढ़ा दिया जाए।

आखिरकार मान गया राजकुमार

अगले दिन जब वैश्यपुत्र को फांसी देने के लिए सैनिक फांसीगृह लेकर चलते हैं,

तो वैश्यपुत्र उनसे काफी मिन्नतें करता है कि कम से कम एक बार उसे राजकुमार से मिलने दिया जाए।

सैनिकों ने तरस खाकर उसे राजकुमार से मिलने दिया।

इस समय तक राजकुमार भी थोड़ा शांत हो चुका था।

वैश्यपुत्र ने राजकुमार को सारी कहानी बताई। ये सारी कहानी राजकुमार की वधू ने भी सुनी।

वधू ने राजकुमार को समझाया कि उसे अपने मित्र पर शक नहीं करना चाहिए।

वधू ने राजकुमार को याद दिलाया कि कैसे विवाह गृह में मरने से वैश्यपुत्र ने ही उसे बचाया था।

वो घटना याद करके राजकुमार का अपने वैश्यपुत्र मित्र पर विश्वास फिर से लौट आया,

और उसने आखिरकार अपने मित्र को क्षमा कर दिया।

कलिंगसेना की कहानी सुनाने की चाहत

यहां तक कहानी पूरी करने के बाद सोमप्रभा ने कलिंगसेना से कहा,

“तो सखी, इस कहानी से हमें संदेश मिलता है कि राजकुमार और राजकुमारियों की मित्रता,

अक्सर साधारण व्यक्ति के लिए अभिशाप बन ही जाती है।

मैंने तुम्हें ये कहानी इसलिए भी सुनाई है ताकि तुम मुझे आश्वासन दे सको,

कि तुम्हारी मित्रता मेरे लिए कभी अभिशाप नहीं बनेगी।

इस पर कलिंगसेना सोमप्रभा से लिपट गई और बोली,

“सखि, ये सच है कि अक्सर राजपुत्र अपने अहंकार में पिशाच बन जाते हैं।

लेकिन कभी-कभी इन्हें वश में रखने के लिए महिलाओं को अशोभनीय चालें भी चलनी पड़ती हैं।

इसी से जुड़ी एक कहानी मैं भी तुम्हें सुनाना चाहती हूं। क्या तुम मेरी कहानी सुनोगी?”

कलिंगसेना की ये बात सुनकर सोमप्रभा काफी खुश हुई,

और उसने कलिंगसेना से कहा कि वो तुरंत अपनी कहानी शुरू करे।

सोमप्रभा ने भी कलिंगसेना के हाथों को ऐसे ही पकड़ लिया,

जैसे कलिंगसेना ने उसके हाथों को तब पकड़ा था जब उसने अपनी कहानी शुरू की थी।

और अंत में

कलिंगसेना ने सोमप्रभा को क्या कहानी सुनाई ये आपको मालूम चलेगा दूसरे भाग में,

क्योंकि ये आर्टिकल पहले ही काफी ज़्यादा लंबा हो चुका है।

लेकिन कृष्ण बलदेव वैद के कहानी संग्रह बदचलन बीवियों का द्वीप की सारी कहानियां हम आपको सुनाएंगे।

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