Ghanta Ghar Meerut की इतनी दिलचस्प History खुद मेरठ वाले भी नहीं जानते होंगे

Ghanta Ghar Meerut - Photo: Social Media

Ghanta Ghar Meerut एक ऐसी इमारत है जो अपनी विशेष बनावट के चलते अपनी तरह की इमारतों में सबसे अनूठी है।

वैसे तो खुद क्रांतिधरा मेरठ भी अपने आप में एक अनूठा शहर है।

भारत के किसी भी पुराने शहर की ही तरह मेरठ में भी आपको वो हर रंग-रूप मिल जाएगा जिसमें भारतीय संस्कृति की झलकियां साफ छलकती हैं।

बात चाहे उद्योगों की हो, व्यापार की हो, स्पोर्ट्स उत्पाद निर्माण की हो या फिर खान-पान की हो।

मेरठ किसी भी मामले में भारत के दूसरे टियर-2 शहरों से पीछे नहीं है।

इतना ही नहीं, मेरठ की कुछ इमारतें बेहद ऐतिहासिक हैं और देश की आज़ादी के दौरान इन इमारतों की यादें भी जुड़ी हैं।

तो दोस्तों Meerut शहर को जानने-समझने की अपनी इस सीरीज़ में आज हम आपको Meerut के मशहूर Clock Tower यानि Ghanta Ghar Meerut से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें बताएंगे।

कब हुआ था Ghanta Ghar Meerut का निर्माण?

मेरठ के घंटाघर का निर्माण अंग्रेजों ने सन 17 मार्च 1913 में शुरू कराया था।

उस समय भी ये इलाक शहर का सबसे भीड़भाड़ वाला इलाका था।

हालांकि उस दौर में इतनी भीड़ नहीं हुआ करती थी जितनी की आज इस इलाके में भीड़भाड़ होती है।

ठीक 1 साल बाद यानि सन 1914 में ये घंटा घर बनकर तैयार हुआ।

इस घंटा घर में लगी घड़ी की कहानी भी बड़ी ही दिलचस्प है।

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Ghanta Ghar Meerut – Photo: Social Media

कहा जाता है कि इस घंटा घर में लगाने के लिए अंग्रेजों ने जर्मनी से घड़ी का ऑर्डर किया था।

लेकिन जिस जहाज से समंदर के रास्ते ये घड़ी आ रही थी वो समंदर में ही डूब गया और उसके साथ ही वो घड़ी भी डूब गई।

तब अंग्रेजों ने उस वक्त इलाहबाद हाईकोर्ट में लगी घड़ी इस घंटाघर में लगवाने के लिए मंगवाई।

1914 में जब ये घंटाघर बनकर तैयार हो गया था, उसके कुछ ही दिनों बाद इलाहबाद हाईकोर्ट वाली ये घड़ी इसमें लगा दी गई।

इलाहबाद हाइकोर्ट में लगी घड़ी स्विटज़रलैंड की मशहूर वेस्ट एंड वॉच नाम की कंपनी की घड़ी थी।

बाद में कई सालों तक ये घड़ी मेरठ वालों को टाइम बताती रही।

Ghanta Ghar Meerut की घड़ी ने बदल दी थी मेरठ वालों की ज़िंदगी

इस घड़ी की खासियत ये थी, कि हर घंटे पर जब इसका पेंडुलम आवाज़ करता था,

तो ये आवाज़ 10 से 15 किलोमीटर दूर तक हर तरफ सुनाई देती थी।

इस घड़ी से ही आस-पास के इलाकों और गांवों के लोग अपनी घड़ियों का टाइम मिलाया करते थे।

इसी घड़ी की आवाज़ से ही आस-पास के इलाकों के मंदिर-मस्ज़िद भी खुला करते थे।

और किसान भी खेतों पर काम करने जाया करते थे।

उस दौर में कई लोग तो इसी घड़ी पर ही पूरी तरह से निर्भर थे।

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Ghanta Ghar Meerut – Photo: Social Media

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी की थी Ghanta Ghar Meerut तारीफ

भारत के महान सपूत और आज़ादी के दीवाने नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी,

सन 1930 में एक दफा घंटा घर के पास ही मौजूद टाउनहॉल में जनसभा करने आए थे।

तब मेरठ ही नहीं, दूर-दूराज के कई और शहरों से भी लोग नेताजी को सुनने के लिए,

मेरठ के घंटा घर के पास स्थित टाउन हॉल पहुंचे थे।

नेताजी ने अपने ओजस्वी भाषणों से लोगों में जोश भर दिया था।

उन्होंने जब मेरठ का घंटाघर देखा था तो उन्हें ये बेहद पसंद आया था।

उन्हीं के नाम पर ही घंटा घर का नाम भी नेताजी सुभाषचंद्र द्वार भी रखा गया।

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Ghanta Ghar Meerut – Photo: Social Media

केवल नेताजी ही नहीं, बल्कि उस दौर के और भी कई बड़े नेता जैसे महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू भी घंटा घर के पास स्थित टाउन हॉल में जनसभाएं कर चुके हैं।

मेरठ के घंटा घर की एक खासियत ये है कि अपनी तरह का ये पूरे भारत में इकलौता क्लॉक टावर यानि घंटा घर है।

इस घंटाघर के नीचे से एक साथ तीन ट्रक आसानी से गुज़र सकते हैं।

इसकी बनावट ही ऐसी है कि इसके नीचे तीन दरवाज़े अंग्रेजों ने बनवाए थे।

ये कहानी भी जुड़ी है Ghanta Ghar Meerut से

मेरठ के घंटा घर से एक कहानी और जुड़ी है।

कहा जाता है कि पहले ये कम्बोह गेट हुआ करता था, जो कि बेहद छोटा था।

तब इस इलाके के आस-पास कम्बोह जाति के लोग रहा करते थे और उन्होंने ही अपनी सुरक्षा के लिए ये गेट बनवाया था।

उस वक्त ये गेट बेहद छोटा था। ब्रिटिश इतिहासकार लिखते हैं कि उस दौर में कोई बड़ा अंग्रेज अधिकारी मेरठ आ रहा था।

उसी के सम्मान में अंग्रेजों कम्बोह गेट तोड़कर घंटा घर बनवाया था।

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Ghanta Ghar Meerut – Photo: Social Media

शुरूआत में कम्बोह जाति के लोगों ने अंग्रेजों द्वारा कम्बोह गेट तोड़ने का विरोध किया था।

लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि कम्बोह गेट का नाम नहीं बदला जाएगा।

इसकी पुरानी पहचान हमेशा कायम रहेगी।

लेकिन वक्त के साथ कम्बोह गेट को लोग भूल गए और ये गेट घंटा घर के नाम से मशहूर हो गया।

जब जर्मनी से आया था घड़ीसाज

ब्रिटिश काल में ही एक दफा मेरठ के घंटा घर की घड़ी खराब हो गई थी।

तब मेरठ के उस वक्त के अंग्रेज कलेक्टर जेम्स रे पियरसन स्क्वायर ने स्विटज़रलैंड की घड़ी निर्माता कंपनी वेस्ट एंड को पत्र लिखकर इसे ठीक करने की गुज़ारिश की।

कंपनी ने उस पत्र के जवाब में लिखा कि मेरठ का रहने वाला अब्दुल अजीज एक शानदार घड़ीसाज है।

फिलहाल वो जर्मनी में है और उसको जल्द से जल्द मेरठ भेजा जाएगा।

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Ghanta Ghar Meerut – Photo: Social Media

घड़ीसाज अब्दुल अजीज जब वापस मेरठ आया तो कलक्टर ने उसे ही इस घंटाघर और इसकी घड़ी के रख-रखाव की ज़िम्मेदारी दे दी।

उसके बाद से ही सालों तक अब्दुल अजीज की पीढ़ियां ही मेरठ के इस घंटा घर की घड़ी की देखभाल की ज़िम्मेदारी उठाती रही।

घंटाघर की सफाई और घड़ी की सर्विसिंग का ज़िम्मा इन्हीं लोगों पर था।

इस तरह बंद हो गई Ghanta Ghar Meerut की घड़ी

अब्दुल अजीज की पीढ़ी के शमशुल अजीज, जो खुद बेहद बुज़ुर्ग हैं वो बताते हैं कि मेरठ के घंटा घर की घड़ी 1990 के बाद से ही बुरी स्थिति में आनी शुरू हो गई।

कई दफा ये खराब हुई, लेकिन प्रशासन ने कभी भी इसको ठीक कराने पर ध्यान नहीं दिया।

मेरठ नगर निगम पर इस घड़ी को ठीक ठाक रखने की ज़िम्मेदारी है, लेकिन ये घड़ी 1990 के बाद कई दफा खराब हुई।

इस घड़ी के पीतल के पुर्जे तक चोरी हो गए।

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Ghanta Ghar Meerut – Photo: Social Media

उसके बाद तो मानो इस घड़ी के बुरे दिन ही आ गए।

कई महीनों तक ये घड़ी बंद पड़ी रही।

हालांकि कई दफा इलाके के लोगों ने मिलकर इसे फिर से चालू ज़रूर कराया, लेकिन ये फिर खराब हुई और बंद हो गई।

जब शाहरुख ने दिए छह लाख रुपए

शाहरुख खान की फिल्म ज़ीरो तो आपको याद ही होगी।

इस फिल्म का मुख्य किरदार बऊआ मेरठ के घंटा घर के इलाके के पास का ही रहने वाला था।

शाहरुख खान पहले यहीं पर फिल्म की शूटिंग करना चाहते थे।

घंटा घर की खड़ी बंद पड़ी थी तो शाहरुख खान ने इसे ठीक कराने के लिए छह लाख रुपए भी दिए।

लेकिन किन्हीं वजहों से शाहरुख खान मेरठ में फिल्म की शूटिंग करने आए ही नहीं।

घंटा घर का सेट मुंबई में ही तैयार कर लिया गया।

शाहरुख की फिल्म ज़ीरो रिलीज़ हुई और फ्लॉप होकर सिनेमा हॉलों से उतर भी गई।

लेकिन घंटा घर की घड़ी अब भी बंद पड़ी है।

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Ghanta Ghar Meerut – Photo: Social Media

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